चुनाव आते ही सोशल मीडिया पर वादों और तस्वीरों की जो ‘बरसात’ शुरू होती है, वह जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसी लगती है।
*कुर्सी का ‘मोह’ या जनता की ‘सेवा’?*
— बीकानेर के गलियारों से उठती टीस
इन दिनों सोशल मीडिया का पेज खोलो तो लगता है जैसे बीकानेर में अचानक ‘जनसेवकों’ की बाढ़ आ गई है। नए-नए चेहरे, हाथ जोड़े हुए पोस्टर, बड़ी-बड़ी बातें और लंबे-चौड़े वादे।
“मैं सड़क बनवा दूंगा…”
“मैं स्ट्रीट लाइटें ठीक करवा दूंगा…”
“मैं नालियों की सफाई करवा दूंगा…”
लेकिन इन वादों के चमकते पोस्टरों के पीछे एक कड़वा सवाल हर बीकानेरवासी के मन में है — “पिछले 5 साल आप कहाँ थे?”
जब मोहल्ले की नालियाँ उफन रही थीं, जब बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों के अंधेरे में कोई बुजुर्ग ठोकर खाकर गिर रहा था, जब गड्ढों से भरी सड़कों पर गाड़ियाँ और लोगों की कमर टूट रही थी… तब यह ‘दर्द’ और यह ‘सेवा भाव’ किस कोने में सोया हुआ था?
सेवा के लिए पद नहीं, नीयत चाहिए
क्या समाजसेवा करने के लिए पार्षद का ‘टैग’ होना ज़रूरी है? क्या एक जागरूक नागरिक बनकर नगर निगम के चक्कर नहीं काटे जा सकते थे? क्या बिना चुनाव लड़े वार्ड की समस्याओं के लिए आवाज़ नहीं उठाई जा सकती थी?
सच्चाई यह है कि सच्चे सेवक को किसी पहचान पत्र या पद की आवश्यकता नहीं होती। जो सच में बीकानेर की मिट्टी और अपने मोहल्ले से प्यार करता है, वह 5 साल तक तमाशबीन बनकर इंतज़ार नहीं करता कि चुनाव आएँगे तो मैं काम करूँगा।
जनता सब समझती है!
चुनाव आते ही अचानक हर प्रत्याशी को अपने वार्ड की धूल, गंदगी और अंधेरा याद आने लगता है। लेकिन बीकानेर की समझदार जनता यह भली-भांति जानती है कि यह जनसेवा का अचानक जागा प्रेम नहीं है, बल्कि ‘पार्षद’ बनने की कुर्सी का आकर्षण है। पद मिलने के बाद का रसूख और सहूलियतें सबको दिखती हैं, लेकिन 5 साल जनता की सुध लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं होती।
सोचने वाली बात:
“जनसेवक” तो बिना चुनाव लड़े भी बना जा सकता है,
लेकिन अगर सेवा सिर्फ़ “पार्षद” बनकर ही हो सकती है…
तो समझ लीजिए, मक़सद जनता का भला नहीं, अपना भला है!
अबकी बार… वादों पर नहीं, काम पर बात होगी!
बीकानेर की जनता अब पोस्टरों की मीठी बातों से बहलने वाली नहीं है। इस बार वोट वादों पर नहीं, पिछले 5 सालों की उपस्थिति और नीयत पर दिया जाएगा।
नेता जी! अगर आपको सच में इस शहर और यहाँ के लोगों से हमदर्दी है, तो पहले यह साबित कीजिए कि बिना किसी पद के आपने इस शहर के लिए क्या किया। क्योंकि जो इंसान नागरिक बनकर अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सका, वह पार्षद बनकर कौन सा चमत्कार कर देगा?














