February 20, 2026 12:13 am

राजस्थान से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक एक आवाज गूंज रही है

*राजस्थान से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक एक आवाज गूंज रही है*

 

“अरावली बचाओ”

 

सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है, सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, गांवों में उपवास की घोषणाएं हो रही हैं और कई नेता जमकर बयान दे रहे हैं , पर्यावरण प्रेमी चिंता कर रहे हैं,

 

यह आंदोलन क्यों छिड़ा है? क्यों लोग सड़कों पर उतर आए हैं? और क्यों यह चेतावनी दी जा रही है कि अगर अरावली पर जल्द फैसला नहीं लिया गया, तो यह सत्ताधारियों के लिए राजनीतिक और पर्यावरणीय दोनों स्तर पर भारी नुकसान साबित होगा?

 

अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है लगभग दो अरब साल पुरानी। गुजरात से दिल्ली तक फैली यह करीब 700 से अधिक किलोमीटर लंबी श्रृंखला राजस्थान के 15 जिलों से गुजरती है। यह सिर्फ पहाड़ियां नहीं, बल्कि उत्तर भारत की “हरी दीवार” है थार मरुस्थल की रेत और धूल भरी आंधियों को रोकने वाली यह दीवार दिल्ली-एनसीआर की हवा को साफ रखती है, भूजल को रिचार्ज करती है, जैव विविधता को संरक्षण देती है और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है सरिस्का टाइगर रिजर्व से लेकर सांभर झील तक, अरावली जीवन का स्रोत है लेकिन नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने इस जीवनरेखा पर संकट ला दिया कोर्ट ने केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश स्वीकार कर ली कि अब केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही “अरावली हिल्स” मानी जाएंगी इससे राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 ही संरक्षित रहेंगी यानी 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा

 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह “अरावली की मौत का वारंट” है छोटी-छोटी रिजेस और ढलानें, जो मरुस्थल को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, अब खनन और निर्माण के लिए खोल दी जाएंगी फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की अपनी आंतरिक रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि यह परिभाषा “केवल कुछ चौकीदारों को बचाएगी, लेकिन बाड़ को सौंप देगी”

 

कल्पना कीजिए अगर अरावली कमजोर पड़ गई, तो थार का रेगिस्तान तेजी से पूर्व की ओर बढ़ेगा। दिल्ली में धूल के गुबार और बढ़ेंगे, प्रदूषण “गैस चैंबर” से भी बदतर हो जाएगा राजस्थान के गांवों में पानी की कमी गंभीर हो जाएगी, क्योंकि अरावली भूजल का मुख्य स्रोत है। जयपुर, उदयपुर, जोधपुर जैसे शहरों में तापमान चरम पर पहुंच जाएगा कृषि प्रभावित होगी, वन्यजीव विलुप्त होंगे, और आदिवासी समुदायों की आजीविका छिन जाएगी यह सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु सुरक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर हमला है

 

यह आंदोलन भावुक इसलिए है क्योंकि अरावली से आमजन का गहरा भावनात्मक जुड़ाव है राजस्थान में अमृता देवी जैसे लोग अरावली के पेड़ों को बचाने के लिए जान दे चुके हैं यहां की पहाड़ियां सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और जीवन का हिस्सा हैं

 

गुरुग्राम से उदयपुर तक प्रदर्शन, तोशाम हिल पर उपवास, और सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट्स यह जनता की पुकार है

 

पर्यावरणविद नीलम अहलूवालिया जैसे लोग चेताते हैं कि “प्रकृति टेप से नहीं नापी जाती” अब सवाल सरकार से है: क्या आप इस चेतावनी को अनसुना करेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने नई खनन लीज पर रोक लगाई है, लेकिन परिभाषा बदलने से दरवाजा खुल गया है केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। पूरी अरावली को “इकोलॉजिकल क्रिटिकल एरिया” घोषित करें, खनन पर पूर्ण रोक लगाएं, और “अरावली ग्रीन वॉल” प्रोजेक्ट को मजबूत बनाएं अगर देर हुई, तो यह आंदोलन सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं रहेगा यह पूरे उत्तर भारत की जनता का गुस्सा बनेगा

 

राजनीतिक नुकसान तो होगा ही, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ियों का होगा, जो किताबों में पढ़ेंगी कि कभी अरावली नाम की एक हरी दीवार थी

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