राजनीति में जीत का जश्न अक्सर इस बात पर निर्भर करता है कि पार्टी सत्ता तक कैसे पहुँची। लेकिन जब जीत के जश्न से ज़्यादा चर्चा अंतर्कलह, बगावत और फाड़-फूट की हो, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पार्टी अपनों से ही हार रही है? हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों को देखें तो बीकानेर कांग्रेस की स्थिति कमोबेश ऐसी ही दिखती है।
कांग्रेस के भीतर सिरदर्द बने ये बड़े विवाद
नेतृत्व और टिकट वितरण पर घमासान-कांग्रेस अध्यक्ष के पद संभालते ही विरोध के सुर उठने लगे थे। स्थिति तब और बिगड़ गई जब पार्षद टिकट वितरण में जमकर विरोध हुआ। सबसे बड़ा आघात तब लगा जब जीते हुए पार्षदों के टिकट काट दिए गए, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा।
शर्मनाक प्रकरण और फजीहत: ‘सिंबल चोरी’ के प्रकरण ने कांग्रेस पार्टी की सार्वजनिक रूप से मिट्टी पलीत कर दी। इसके बाद अध्यक्ष के साथ मारपीट फिर मुकदमा दर्ज होने से पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुँचा।
बहुमत के बाद भी बगावत–नगर निकाय चुनावों में बहुमत होने के बावजूद पार्टी का मेयर प्रत्याशी चयन होने के बावजूद अन्य व्यक्ति का बागी हो कर मेयर पर्चा दाखिल करना किसी पीछे अंदरूनी सपोट के संभव नहीं है !
विडंबना यह है कि बीजेपी बहुमत से कोसों दूर होने के बावजूद मेयर बनने का दावा ठोक रही है।
12 साल बाद की जीत- हकीकत या इत्तेफाक?
करीब 12 साल के लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस को बहुमत मिलना बीकानेर में किसी चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन इस जीत का असली सच कुछ और ही है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत कांग्रेस की किसी मजबूत रणनीति का परिणाम नहीं थी, बल्कि बीजेपी के बागियों और निर्दलयों द्वारा बीजेपी उम्मीदवारों को हराने की वजह से कांग्रेस को यह मुकाम मिला। यानी कांग्रेस की यह जीत दरअसल बीजेपी की आपसी फूट का उप-उत्पाद नतीजा थी।
क्या बीकानेर कांग्रेस को बीजेपी चला रही है?
इन तमाम घटनाओं—चाहे वह सिंबल चोरी का मामला हो, ऐन वक्त पर टिकट काटना हो, या फिर बहुमत होने पर भी मेयर की कुर्सी पर संकट मंडराना हो—को देखकर जनता के मन में एक ही सवाल कौंध रहा है:
“कहीं ऐसा तो नहीं कि बीकानेर कांग्रेस को कांग्रेस नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे से बीजेपी ही चला रही है?”
जब पार्टी के अपने नेता ही फैसलों से ज्यादा गुटबाजी में व्यस्त हों, तो विरोधियों को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बीकानेर में कांग्रेस के सामने बाहरी दुश्मन से ज्यादा अपने भीतर छिपे ‘विभीषण’ और नेतृत्व की कमजोरी बड़ी चुनौती बन चुकी है।
क्या आपको लगता है कि बीकानेर कांग्रेस इस अंदरूनी कलह से उबरकर भविष्य में मजबूत विपक्ष या सत्ता के विकल्प के रूप में उभर पाएगी?
नारायण जैन













