February 20, 2026 4:28 am

आईसीएआर के महानिदेशक व सचिव डेयर डॉ. मांगीलाल जाट रहे बीकानेर दौरे पर

*सातों आईसीएआर संस्थानों का किया निरीक्षण व वैज्ञानिकों को दिए आवश्यक दिशा निर्देश दिए*

*आईसीएआर संस्थान परस्पर बेहतर समन्वय से कृषक हित में करें और बेहतर अनुसंधान*

*अनुसंधान का अधिकाधिक लाभ किसानों को मिले- डॉ. मांगीलाल जाट*

 

बीकानेर, 29 जनवरी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली के सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक, आईसीएआर डॉ मांगी लाल जाट बीकानेर दौरे पर रहे। जाट ने बीकानेर में स्थापित आईसीएआर संस्थान केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान मरू क्षेत्रीय परिसर, केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, मूंगफली अनुसंधान निदेशालय क्षेत्रीय केंद्र, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र अश्व उत्पादन परिसर व राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र का भ्रमण व निरीक्षण किया। डॉ जाट ने आईसीएआर संस्थान के वैज्ञानिकों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए तथा अपने उद्बोधन में कहा कि आईसीएआर संस्थान परस्पर बेहतर समन्वय से कृषक हित में काम करें ओर बेहतर स्थानीय परिस्थितीय तंत्र अनुरूप अनुसंधान करें ताकि अनुसंधान का अधिकाधिक लाभ किसानों को मिल सके। इस दौरान आईसीएएच द्वारा प्रायोजित 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ भी डॉ जाट ने किया।

आईसीएआर संस्थानों के भ्रमण व निरीक्षण के दौरान राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर के कुलगरू डॉ. सुमंत व्यास उपस्थित रहे। निरीक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रोटोकॉल व लाइजन अधिकारी सहायक निदेशक उद्यान मुकेश गहलोत भी उपस्थित रहे।

डॉ. मांगीलाल जाट ने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में आईसीएआर संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। जाट ने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में शुष्क बागवानी व पशुपालन किसानों की आजीविका का एक सशक्त माध्यम बनकर उभर रही है। उन्होंने कहा कि शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फल एवं सब्जी फसलें भविष्य में किसानों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी। इस दौरान कुलगुरू राजूवास डॉ. सुमंत व्यास ने प्राकृतिक खेती में पशुधन का समन्वय वर्तमान आवश्यकता पर बल दिया। व्यास ने अपने संबोधन में कहा कि बागवानी फसलों के साथ पशुपालन का समन्वय समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती में पशुधन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा पशुपालन के बिना प्राकृतिक खेती की कल्पना संभव नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे कृषि एवं पशुपालन के समन्वित मॉडल विकसित करें, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो सके और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा मिले।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद संस्थान निदेशक सीआईएएच डॉ जगदीश राणे, निदेशक एनआरसीसी डॉ अनिल कुमार पुनिया, प्रभागाध्यक्ष एनआरसीई डॉ एस सी मेहता, प्रभागाध्यक्ष काजरी डॉ एन आर पंवार, प्रभागाध्यक्ष सीएसडब्ल्यूआरआई डॉ निर्मला सैनी, अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार डॉ टी के भट्टाचार्य, डॉ एसपीएस तंवर, प्रभागाध्यक्ष आईआईपीआर डॉ सुधीर कुमार, प्रभारी अधिकारी डीजीआर डॉ नरेंद्र कुमार व अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक गण, कर्मचारीगण तथा शीतकालीन विद्यालय के प्रतिभागी उपस्थित रहें।

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