विशेष सूचना / आगामी कल का आकर्षण
राजनीति के इन उलझे गणित और चौंकाने वाले उलटफेर का पर्दाफाश कल
बीकानेर नगर निगम चुनावों के परिणाम आने के बाद से ही शहरभर के राजनीतिक गलियारों और आमजन की जुबान पर एक ही सवाल है—जहाँ 2019 के चुनावों में कांग्रेस को महापौर पद पर 37 और उपमहापौर पद पर 39 मत मिले थे, वहीं इस बार (2026 में) ठीक इसका उल्टा देखने को मिला।
इस बार महापौर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अनिल कल्ला ने 50 मत हासिल कर जहाँ रिकॉर्ड जीत दर्ज की, वहीं उनके सामने भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह शेखावत को मात्र 30 मतों से संतोष करना पड़ा। इसके ठीक विपरीत, अगले ही दिन उपमहापौर के चुनाव में समीकरण पूरी तरह पलट गए; जहाँ कांग्रेस प्रत्याशी नसीमा बानो सिमटकर 38 वोटों पर आ गईं, वहीं अल्पमत में दिख रही भाजपा के उपमहापौर प्रत्याशी पंकज गहलोत ने बाजी पलटते हुए 40 वोट हासिल कर जीत का परचम फहरा दिया।
आखिर कैसे बदला 24 घंटे के भीतर हवा का रुख? कहाँ हुई क्रॉस वोटिंग और क्या रहा इस सियासी उठापटक का अंदरूनी सच?
इन तमाम सवालों के सटीक और विश्लेषणात्मक खुलासे के साथ पढ़िए कल हमारे न्यूज़ पेपर में विस्तृत रिपोर्ट…
जनता की अदालत में बागी
फिर सियासत में हर बार कसूरवार सिर्फ बागी क्यों?
बीकानेर:
बीकानेर नगर निगम चुनाव के परिणाम महज सीटों का गणित नहीं हैं, बल्कि यह उस अंतर्कलह और राजनीतिक विडंबना का आईना हैं जो हर चुनाव के बाद सतह पर आ जाती है। इस बार के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा—दोनों ही प्रमुख दलों से टिकट न मिलने पर कई नेता बागी हुए और मैदान में निर्दलीय उतरे। इन बागियों ने कहीं समीकरण बिगाड़े तो कहीं संहारे, और परिणाम बड़े उलटफेर के रूप में सामने आए।
चुनाव के बाद का दस्तूर भी पुराना ही रहा है। दोनों ही दलों के नेता और आलाकमान अब इन बागियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग का राग अलाप रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच शहर की आम जनता, जो हर सियासी ड्रामे को बहुत करीब से देखती है, उसकी सोच इन नेताओं से बिल्कुल जुदा है।
जनता का सवाल: कसूरवार सिर्फ बागी ही क्यों?
जनता दबी जुबान में नहीं, बल्कि पूरे ठरके के साथ यह सवाल पूछ रही है कि आखिर कार्रवाई की यह तलवार सिर्फ निर्दलीय लड़ने वाले बागियों पर ही क्यों लटकाई जा रही है?
आज राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र किसी से छिपा नहीं है। जनता का सीधा और तीखा तर्क है—
जब भाजपा का कोई नेता टिकट न मिलने पर रातों-रात कांग्रेस का दामन थामकर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ सकता है…
या जब कांग्रेस का कोई बागी पाला बदलकर भाजपा की गोद में जा बैठता है और दोनों दल पलक पावड़े बिछाकर उनका स्वागत करते हैं…
तो फिर जो नेता पार्टी से टिकट न मिलने पर अपनी जिद और उसूलों पर अड़ा रहा, किसी विरोधी खेमे में जाकर अपनी विचारधारा की बोली नहीं लगाई, और डंके की चोट पर निर्दलीय मैदान में उतरा—वह पार्टी की नजरों में गुनहगार और कार्रवाई का हकदार कैसे हो गया?
जो नेता टिकट के लालच में कल तक जिस पार्टी को कोसते थे, आज पाला बदलकर उसी के झंडे उठा रहे हैं, उनका स्वागत हो रहा है; और जो अपनी स्वाभिमानी लड़ाई लड़ रहा है, उसे पार्टी से बाहर करने का डंडा पीटा जा रहा है—यह न्याय नहीं, राजनीतिक पाखंड है।
फिल्मी पर्दे का एक मशहूर संवाद आज बीकानेर की इस पूरी राजनीतिक माथापच्ची पर बिल्कुल सटीक बैठता है—
“फुटपाथ सोने के लिए नहीं होते… फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते…”
यानी हर बार नियमों का डंडा सिर्फ कमजोर या एक तरफ के लोगों पर ही क्यों चले? इसी तर्ज पर जनता पूछ रही है—क्या सिर्फ बागी और निर्दलीय ही कार्रवाई का दंश झेलने के लिए बने हैं?
अगर कार्रवाई का डंडा चलाना ही है, तो उन दलबदलू नेताओं पर भी चलना चाहिए जो टिकट के खातिर अपनी विचारधारा गिरवी रखकर रातों-रात पाला बदल लेते हैं। पार्टियों को यह समझना होगा कि जो बागी अपनी पार्टी छोड़कर विरोधी दल में नहीं गया, कम से कम उसने अपनी वैचारिक निष्ठा तो नहीं बेची।
बीकानेर की जनता ने इस बार चुनाव में जो उलटफेर किया है, वह सिर्फ वोटों का खेल नहीं है, बल्कि एक संदेश है। दोनों प्रमुख दलों के शीर्ष नेतृत्व को अब आतम मथन करना होगा। बंद कमरों में बैठकर सिर्फ बागियों पर गाज गिराने से काम नहीं चलेगा। जनता की अदालत में आज बागी निर्दोष और विचारधारा बदलकर टिकट झटकने वाले अवसरवादी कटघरे में खड़े हैं। समय आ गया है कि दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर राजनीतिक शुचिता पर विचार किया जाए, वरना जनता की पैनी नजरें सब देख रही हैं, और वक्त आने पर हिसाब भी बराबर होता है
नारायण जैन की कलम से फोटो सहित














