*✍️“कीमत से परे कलम”✍️*
*वो कीमत लगा रहे थे पत्रकारिता की,*
*मैंने भी मुस्कुरा कर कह दिया*
*कीमत कोई भी हो साहब*,
*मुझे दो कौड़ी का नहीं बनना।*
*तुम्हारे पास दौलत होगी, रसूख होगा,*
*तुम्हारी मेज़ों पर नोटों की चमक होगी,*
*पर मेरे पास जो है*
*वो बिकता नहीं…*
*वो है मेरा ज़मीर, मेरी आवाज़, मेरी कलम।*
*तुमने सोचा होगा,*
*जैसे हर चीज़ खरीदी जाती है इस दुनिया में,*
*वैसे ही खबर भी बिक जाएगी,*
*वैसे ही सच भी झुक जाएगा*
*पर तुम भूल गए,*
*कुछ लोग अभी भी ज़िंदा हैं*
*जो अपने शब्दों को सांस की तरह जीते हैं।*
*कलम बेची नहीं जाती,*
*ये तो भीतर उठती हुई वो पुकार है*
*जो रातों की नींद छीन लेती है,*
*जो अन्याय देख कर चुप नहीं बैठती।*
*और जो बिक गई बाजारों में*,
*वो खबर नहीं इश्तिहार होती है,*
*वो आवाज़ नहीं गूंज होती है*
*किसी और के इशारों की।*
*मैंने देखे हैं वो चेहरे,*
*जो कभी सच के लिए जले थे,*
*आज उन्हीं के हाथों में*
*सौदों की फाइलें हैं।*
*मैंने सुनी हैं वो आवाज़ें,*
*जो कभी सवाल करती थीं,*
*आज वही आवाज़ें*
*स्क्रिप्ट पढ़ती हैं…*
*और तालियाँ बटोरती हैं।*
*पर मैं…*
*मैं उस भीड़ का हिस्सा नहीं बन सकता,*
*जहाँ आत्मा गिरवी रखी जाती है*
*और खबरों का वजन*
*नोटों से तौला जाता है।*
*सच लिखने की सज़ा भी मंज़ूर है मुझे,*
*पर झूठ की बोली में शामिल नहीं होना,*
*तुम सौदे करते रहो सियासत के मेले में,*
*मुझे अपनी आत्मा से गद्दारी नहीं करना।*
*तुम्हारे लिए ये धंधा होगा,*
*मेरे लिए ये धर्म है*
*जहाँ हर शब्द*
*एक जिम्मेदारी है,*
*जहाँ हर खबर*
*एक जवाबदेही है।*
*तुम कहते हो“कीमत बताओ”,*
*मैं कहता हूँ“हिम्मत लाओ”,*
*क्योंकि सच लिखने के लिए*
*जेब नहीं,*
*सीना चाहिए।*
*तुम्हारी दुनिया में*
*सब कुछ बिकता होगा*
*ईमान, रिश्ते, फैसले,*
*पर मेरी दुनिया में*
*कुछ चीज़ें आज भी अमूल्य हैं।*
*मैं वही रहूँगा*
*स्याही से लड़ता, सवालों से जूझता,*
*हर उस दरवाज़े पर दस्तक देता*
*जहाँ सच को कैद किया गया है।*
*तुम्हारे इशारों पर*
*मैं अपना ईमान नहीं मोड़ूँगा,*
*तुम्हारी मेहरबानियों के बदले*
*मैं अपने शब्द नहीं तोड़ूँगा।*
*और सुन लो*
*ये जो तुम कीमतों का खेल खेलते हो,*
*एक दिन यही बाजार*
*तुम्हारी पहचान निगल जाएगा।*
*क्योंकि इतिहास ने हमेशा*
*खरीदारों को नहीं,*
*सच लिखने वालों को याद रखा है।*
*मैं तस्वीरों का मोहताज नहीं,*
*मैं तारीख़ का हिस्सा बनना चाहता हूँ,*
*जहाँ मेरे शब्द*
*किसी की आँख खोलें,*
*किसी की आवाज़ बनें।*
*तो रख लो अपनी दौलत,*
*सजा लो अपने सौदे,*
*मैं उस रास्ते का मुसाफिर हूँ*
*जहाँ कदम डगमगाते हैं,*
*पर आत्मा सीधी खड़ी रहती है।*
*मैं पत्रकार हूँ*
*बेचने वाला नहीं,*
*जगाने वाला हूँ।*
*और याद रखना*
*जिस दिन सच ने करवट बदली,*
*उस दिन तुम्हारे हर सौदे पर*
*मेरे शब्द ही*
*सबसे बड़ा तमाचा बनकर गिरेंगे।*
*विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस की सभी पत्रकार साथियों को 3 मई 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं*
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फ्रंट भारत न्यूज नेटवर्क













