June 19, 2026 3:21 pm

बीकानेर में बिजली का संकट: बुनियादी जरूरतों का बाजारीकरण और सुलगती जिंदगियां

बीकानेर राजस्थान का वह ऐतिहासिक शहर जो अपने सुनहरे धोरों, शानदार हवेलियों और मीठे रसगुल्लों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन इन दिनों इस शहर की पहचान कुछ और ही बन गई है— आसमान से बरसती आग, पसीने से लथपथ जागती हुई रातें और बीकेईएसएल (BKESL) के दफ्तरों के बाहर अपनी फरियाद लेकर खड़े बेबस लोगों की खामोश चीखें।

जब पारा 45 से 50 डिग्री के बीच झूल रहा हो और लू के थपेड़े शरीर को झुलसा रहे हों, तब रेगिस्तान में बिजली कोई विलासिता नहीं, बल्कि सांस लेने जितनी ही बुनियादी जरूरत बन जाती है। लेकिन बीकानेरवासियों के लिए यह जरूरत अब एक ऐसा संघर्ष बन गई है, जिसने आम आदमी को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हर तरह से तोड़ कर रख दिया है।

बुनियादी जरूरत या मुनाफे की मंडी?

बिजली और पानी किसी भी समाज की मूलभूत और बुनियादी जरूरतें हैं। एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी व्यवस्था में इन जरूरतों को कभी भी नफा-नुकसान या बैलेंस-शीट के तराजू पर नहीं तौला जाना चाहिए। यह सरकार का प्राथमिक दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को ये सुविधाएं बिना किसी रुकावट मुहैया कराए।

लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस बिजली को जीवन का अधिकार होना चाहिए था, उसे सरकार ने एक निर्दयी व्यापार बना दिया। बीकानेर की जनता आज यह सवाल पूछ रही है कि हमारी सांसों और सुकून को बीकेईएसएल (BKESL) जैसी निजी कंपनी के हाथों में क्यों गिरवी रख दिया गया? जब जीवन की मूलभूत जरूरतें कॉरपोरेट के हाथों में जाती हैं, तो ‘सेवा’ की हत्या हो जाती है और ‘मुनाफा’ उस लाश पर अपना महल बनाता है।

आज बीकानेर का हर नागरिक खुद को छला हुआ महसूस कर रहा है। इस पूरी व्यवस्था को अगर गहराई से समझें तो एक बहुत ही सटीक और दर्दनाक उदाहरण सामने आता है।

जैसे एक अखबार बांटने वाला हॉकर, सालों तक अपने इलाके में ग्राहकों को अखबार देता है। लोग उस पर एक पारिवारिक सदस्य की तरह भरोसा करते हैं। लेकिन फिर एक दिन, बिना अपने ग्राहकों की मर्जी जाने, बिना उनसे पूछे, वह अपनी उस ‘कस्टमर लाइन’ को किसी अन्य अनजान और मुनाफे के लिए दूसरे हॉकर को लाखों रुपयों में बेच देता है। उस सौदे में उन ग्राहकों की हैसियत सिर्फ एक ‘बिकाऊ वस्तु’ की रह जाती है।

हमारी अपनी चुनी हुई सरकार ने बीकानेर की जनता के साथ बिल्कुल ऐसा ही बर्ताव किया। बीकानेर के लाखों नागरिकों को बिना भरोसे में लिए, बिना उनका दर्द समझे, रातों-रात **🄱🄺🄴🅂🄻** के हाथों बेच दिया गया। हम अब जीते-जागते इंसान नहीं रहे, बल्कि महज़ एक ‘कस्टमर बेस’ बनकर रह गए हैं

इस अंधे व्यापार और निजीकरण का सबसे खौफनाक सच आंकड़ों में छिपा है। बताया जाता है कि बीकानेर की बिजली व्यवस्था का ठेका लेने से पूर्व 🄱🄺🄴🅂🄻 के मालिक (गोयनका) की जो आय थी, वह आज **5 गुना** तक बढ़ चुकी है!

बात सिर्फ आय बढ़ने तक ही सीमित नहीं है; आज यह कंपनी **’प्रॉफिट आफ्टर टैक्स’ (PAT – शुद्ध मुनाफे)** के विशाल स्तर पर काबिज है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अपने सारे तामझाम, वेतन, खर्चे और सरकार को भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बाद भी, करोड़ों रुपयों का विशुद्ध मुनाफा सीधे इनकी तिजोरियों में जा रहा है।

जरा इस हृदयविदारक विषमता पर गौर कीजिए। एक तरफ 🄱🄺🄴🅂🄻 के वातानुकूलित (AC) दफ्तरों में बैठे अधिकारी मुनाफे की फाइलें पलट रहे हैं, और दूसरी तरफ टीन की तपती छत के नीचे बैठा एक दिहाड़ी मजदूर पिता पसीने से भीगे तौलिये से अपनी बेबसी पोंछ रहा है। वह इसलिए नहीं रोता कि उसे गर्मी लग रही है, बल्कि इसलिए रोता है क्योंकि दिन भर खून-पसीना एक करके और भारी-भरकम ‘स्मार्ट बिल’ भरने के बावजूद, वह रात को अपने बच्चों को चैन की नींद नहीं दे पा रहा है।

इस पूरी त्रासदी में 🄱🄺🄴🅂🄻 और प्रशासन का दोहरा क्रूर मापदंड किसी भी संवेदनशील इंसान का खून खौलाने के लिए काफी है।

एक तरफ यह मुनाफे में अंधी हो चुकी कंपनी है, जिस पर नगर निगम का **लाखों रुपये का यूडी टैक्स (UD Tax) बकाया है**। शहर के लाखों रुपये डकार कर भी 🄱🄺🄴🅂🄻 आराम से बैठी है, ना इनके दफ्तरों की बिजली कटती है और ना ही इन पर कोई सख्त कार्रवाई होती है।

लेकिन दूसरी तरफ बीकानेर का वह बेबस आम उपभोक्ता है, जिसे अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात जूझना पड़ता है। अगर किसी महीने मजबूरीवश उस ग्राहक का चंद **सैकड़ों या हजारों रुपये** का बिजली बिल बाकी रह जाए, तो इस कंपनी के कर्मचारी बिना कोई मोहलत दिए, बिना किसी इंसानियत के उसका कनेक्शन काटने पहुंच जाते हैं।

क्या इस शहर के सारे नियम, कायदे और कानून सिर्फ गरीबों और आम जनता को सताने के लिए बने हैं? जो कंपनी खुद सरकार का लाखों का टैक्स दबाकर बैठी है, उसे आम आदमी के घर का अंधेरा करने का अधिकार किसने दे दिया?

आज बीकानेर का आम नागरिक गुस्से में कम और गहरी पीड़ा में ज्यादा है। प्रशासन को यह समझना होगा कि यह केवल “पॉवर कट” का तकनीकी मामला नहीं है। यह उन बुजुर्गों की टूटती सांसों का सवाल है। यह उस मां की ममता का सवाल है जो रात भर जागकर अपने बच्चे को गर्मी से बचाने की जद्दोजहद करती है।

मुनाफा कमाना किसी कंपनी का उद्देश्य हो सकता है, लेकिन किसी सरकार का काम अपनी ही जनता को मुनाफे की वेदी पर बलि चढ़ाना नहीं होता। 🄱🄺🄴🅂🄻 को अपने कागजी दावों से बाहर निकलकर बीकानेर के उन तपते आंगनों को देखना होगा। जिनकी तिजोरियां जनता के पसीने से भर रही हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि आम आदमी के आंसुओं और पसीने का कर्ज बहुत भारी होता है।

वक्त आ गया है कि यह सोई हुई व्यवस्था जगे, इससे पहले कि बीकानेर के लोगों का दर्द और धैर्य इस तपते रेगिस्तान की तरह भयंकर ज्वाला में बदल जाए।

नारायण जैन विशेष समीक्षक

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