July 20, 2026 9:15 pm

मातृत्व पर मंडराता मौत का साया: “नाचती-कूदती आई थी क्या?” पूछने वाला संवेदनहीन सिस्टम


माँ बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे सुखद और पवित्र अहसास माना जाता है। लेकिन क्या हो जब जीवन देने की यह प्रक्रिया ही मौत का कारण बन जाए? बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में आज एक प्रसूता की मौत कोई सामान्य घटना या केवल एक मेडिकल जटिलता नहीं है; यह हमारे लचर स्वास्थ्य तंत्र, अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही और सत्ता के नशे में चूर राजनेताओं की बेशर्मी का जीता-जागता प्रमाण है।
**एक साथ छह मामले: यह संयोग नहीं, ढांचागत हत्या है**
इस पूरी घटना का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं था। एक ही अस्पताल में, प्रसव के बाद एक साथ छह महिलाओं की किडनी फेल हो जाना किसी भी दृष्टिकोण से “संयोग” नहीं हो सकता।
* क्या प्रसूताओं को दी गई दवाइयों के बैच में कोई मिलावट या खोट था?
* क्या ऑपरेशन थियेटर (OT) या वार्ड में कोई भयंकर जानलेवा संक्रमण (Infection) फैला हुआ था?
* या फिर खून चढ़ाने की प्रक्रिया में कोई भारी चूक हुई?
बिना किसी गंभीर लापरवाही के छह स्वस्थ महिलाओं के प्रमुख अंगों का एक साथ काम करना बंद कर देना चिकित्सा विज्ञान के सामान्य नियमों के खिलाफ है।
**संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: मंत्री का बेतुका और क्रूर बयान**
इस पूरी त्रासदी में सबसे शर्मनाक और आक्रोश पैदा करने वाला पहलू जिम्मेदार मंत्री का वह अमानवीय बयान है, जिसने सत्ता के अहंकार को पूरी तरह नंगा कर दिया है। जब एक और प्रसूता महिलाएं जिंदगी की जंग लड़ रही हैं, तब मंत्री महोदय का यह बेतुका सवाल दागना कि— **”नाचती-कूदती आई थी क्या?”**—केवल एक गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह एक महिला की मौत, उसके मातृत्व और उस परिवार के आंसुओं का क्रूर मजाक है।
अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेने, स्वास्थ्य महकमे को फटकार लगाने और व्यवस्था की खामियों को स्वीकार करने के बजाय, ऐसा ओछा बयान देना यह साबित करता है कि आम जनता की जान की कीमत इन राजनेताओं की नजरों में क्या है। एक गर्भवती महिला अस्पताल में इलाज और सुरक्षित प्रसव की उम्मीद से आती है, न कि इस तरह के अमानवीय तंज सुनने के लिए। मंत्री का यह बयान पीड़ित परिवार के रिसते जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है।
**प्रशासन का ‘हड़कंप’: बहुत देर से उठाया गया कदम**
खबरों के अनुसार आज एक प्रसूता की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन में ‘हड़कंप’ मचा हुआ है। लेकिन यह हड़कंप तब क्यों नहीं मचा जब एक के बाद एक महिलाओं की किडनी फेल हो रही थी? प्रशासन की यह नींद तब क्यों टूटती है जब कोई जान चली जाती है? एक महीने तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही, लेकिन अस्पताल प्रशासन इस जानलेवा पैटर्न को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहा।
**नवजात और परिवार का क्या?**
सिस्टम की इस लापरवाही की सबसे बड़ी कीमत उस *नवजात शिशु* ने चुकाई है, जिसने दुनिया में आते ही अपनी माँ को खो दिया। उस परिवार को हमेशा के लिए एक ऐसा दर्द दे दिया गया है जिसकी भरपाई कोई सरकारी मुआवजा या मंत्री के खोखले शब्द नहीं कर सकते।
**निष्कर्ष और मांग**
प्रसूता की मौत को सिर्फ एक आंकड़ा मानकर फाइलों में नहीं दबाया जाना चाहिए और न ही मंत्रियों को ऐसे क्रूर बयानों के पीछे छिपने की इजाजत मिलनी चाहिए। इस मामले की मांगें स्पष्ट हैं:
1. **सार्वजनिक माफी:** स्वास्थ्य मंत्री अपने इस बेहद शर्मनाक और अमानवीय (“नाचती-कूदती आई थी क्या?”) बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें और नैतिक जिम्मेदारी लें।
2. **उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच:** इस पूरे प्रकरण की एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच हो, जिसमें स्थानीय प्रशासन का कोई दखल न हो।
मातृत्व सुरक्षित होना चाहिए, जानलेवा नहीं। जब तक दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिलती और ऐसे बेतुके बयान देने वालों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक ऐसी घटनाओं को ‘हादसा’ नहीं, बल्कि ‘सिस्टम द्वारा की गई हत्या’ ही माना जायेगा

​विशेष समीक्षक नारायण ​

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