क्या वे नाचती हुई आई थीं?’ – एक स्वास्थ्य मंत्री का शर्मनाक बयान
माँ बनना दुनिया के सबसे खूबसूरत लेकिन सबसे पीड़ादायक अनुभवों में से एक है। एक महिला जब अस्पताल के प्रसूति वार्ड में कदम रखती है, तो वह अपनी जान हथेली पर रखकर एक नए जीवन को जन्म देने जाती है। वह कोई मरीज नहीं होती, बल्कि सृजनकर्ता होती है। लेकिन क्या हो जब अस्पताल की लापरवाही के कारण एक नहीं, बल्कि कई प्रसूताओं की सी-सेक्शन (C-Section) के बाद तबीयत बिगड़ जाए और उनकी किडनी फेल होने लगे? यह किसी भी सभ्य समाज के लिए एक खौफनाक त्रासदी है।
लेकिन इस त्रासदी से भी ज्यादा खौफनाक और शर्मनाक है हमारे राजनेताओं का वह अहंकार, जो सत्ता के नशे में इस कदर चूर है कि उन्हें एक तड़पती हुई माँ का दर्द भी ‘तमाशा’ नजर आता है। हाल ही में, जब प्रसूताओं की बिगड़ती हालत पर राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछे गए, तो उनका जवाब था— **”वे पैदल चलकर नाचती हुई आई थीं या बीमार होकर आई थीं?”**
यह सिर्फ एक बयान नहीं है; यह हमारे चरमराते स्वास्थ्य तंत्र की बेशर्मी का घोषणापत्र है। यह उस अहंकार की पराकाष्ठा है जहाँ एक जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति अपनी नाकामी छुपाने के लिए पीड़ितों का ही मजाक उड़ाने पर उतारू हो जाता है।
प्रसव कोई ‘बीमारी’ नहीं है, मंत्री जी!
सबसे पहले तो मंत्री महोदय को यह बुनियादी बात समझनी चाहिए कि गर्भावस्था और प्रसव कोई ‘बीमारी’ नहीं है। अस्पताल में भर्ती होने वाली वह महिला कोई पुरानी लाइलाज बीमारी लेकर नहीं आई थी। वह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने आई थी। सी-सेक्शन एक सर्जिकल प्रक्रिया है और उसके बाद अगर महिलाओं को भयानक संक्रमण (Infection) हो रहा है या उनकी किडनी फेल हो रही है, तो यह सीधे तौर पर अस्पताल प्रशासन, वहां की साफ-सफाई, और वहां दी जा रही चिकित्सा सुविधाओं की **आपराधिक लापरवाही (Criminal Negligence)** है।
अपनी इस घोर विफलता का ठीकरा उन माताओं के सिर फोड़ना, जो अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही हैं, एक मंत्री को शोभा नहीं देता।
नाचती हुई आई थीं?’ – शब्दों का यह जहर कहाँ से आता है?
“क्या वे नाचती हुई आई थीं?” — इन शब्दों में जो क्रूरता छिपी है, वह हृदयविदारक है। क्या मंत्री जी को यह लगता है कि गरीब और मध्यम वर्ग की जो महिलाएं सरकारी अस्पतालों में जाती हैं, उनके जीवन का, उनके सम्मान का कोई मोल नहीं है? जिन परिवारों ने अपनी बेटियों, अपनी बहुओं को एक नई खुशी के इंतजार में अस्पताल भेजा था, आज जब वे उन्हें वेंटिलेटर या डायलिसिस पर देख रहे होंगे, तो मंत्री जी का यह बयान उनके सीने में खंजर की तरह उतरा होगा।
एक चिकित्सा मंत्री का काम क्या होता है? जब कोई मेडिकल त्रासदी होती है, तो मंत्री का कर्तव्य है कि वह पीड़ितों के परिवारों को ढांढस बंधाए, मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच के आदेश दे, और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में ऐसा न हो। लेकिन यहाँ तो मंत्री जी पत्रकारों के सवालों से झल्लाकर अपनी असंवेदनशीलता का नंगा नाच कर रहे हैं।
सत्ता का अंधापन और जवाबदेही से भागने की फितरत
यह घटना साबित करती है कि जब राजनेता जनता से कट जाते हैं, तो उनमें संवेदना नाम की चीज खत्म हो जाती है। वे भूल जाते हैं कि वे उसी जनता के वोटों से चुनकर उस कुर्सी तक पहुंचे हैं। जब सवाल तीखे होते हैं और व्यवस्था की पोल खुलती है, तो बजाय यह कहने के कि “हम जांच करेंगे और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा”, वे कुतर्क का सहारा लेते हैं।
किडनी फेल होना कोई मामूली बात नहीं है। यह जीवन भर का दर्द है। जो माँ अभी अपने नवजात शिशु को सीने से लगाकर उसे दूध पिलाना चाहती थी, वह आज डायलिसिस की मशीनों के बीच तड़प रही है। और सूबे के चिकित्सा मंत्री उनके ‘बीमार’ होने का प्रमाण पत्र मांग रहे हैं।
एक माफी काफी नहीं, न्याय चाहिए
मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर का यह बयान न केवल उन पीड़ित महिलाओं का, बल्कि देश की हर उस माँ का अपमान है जिसने प्रसव की पीड़ा सही है। लोकतंत्र में ऐसी निरंकुशता और अमानवीयता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
मंत्री महोदय को अपने इस निंदनीय और ओछे बयान के लिए सार्वजनिक रूप से, बिना किसी शर्त के माफी मांगनी चाहिए। लेकिन बात सिर्फ माफी पर खत्म नहीं होनी चाहिए। उन सभी पीड़ित प्रसूताओं के सर्वोत्तम इलाज की जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए, उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए और जिन डॉक्टरों या स्टाफ की लापरवाही से यह हालात पैदा हुए, उन पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
हम एक ऐसा समाज नहीं बन सकते जहाँ माताओं की चीखें सत्ता के बहरे कानों से टकराकर लौट जाएं और हुक्मरान उनके दर्द पर अट्टहास करें। यह बयान याद रखा जाएगा, और जनता समय आने पर इस ‘अहंकार’ का जवाब जरूर देगी।
नारायण जैन
अध्यक्ष कच्ची बस्ती विभाग बीकानेर














